मेरी याद के लिये नमाज़ क़ायम कर
(अल कुरान 20 : 14)
नमाज़ इस्लाम का सबसे अहम अमल है। यह सिर्फ एक इबादत नहीं बल्कि बंदे और उसके रब के बीच का मजबूत रिश्ता है। कुरआन शरीफ में अल्लाह तआला ने कई जगह नमाज़ की अहमियत बयान की है। उन्हीं में से एक बहुत खूबसूरत आयत है:
“मेरी याद के लिये नमाज़ क़ायम कर।”
— (सूरह ताहा : 20, आयत : 14)
इस छोटी सी आयत में नमाज़ का असली मकसद बयान कर दिया गया है। नमाज़ सिर्फ उठने-बैठने का नाम नहीं, बल्कि अल्लाह की याद में दिल को जोड़ने का जरिया है। जब इंसान नमाज़ पढ़ता है, तो वह दुनिया की भागदौड़ और परेशानियों को छोड़कर अपने पैदा करने वाले रब के सामने खड़ा होता है।
नमाज़ अल्लाह की याद है
आज इंसान अपनी जिंदगी में बहुत व्यस्त हो गया है। पैसा, कारोबार, मोबाइल, सोशल मीडिया और दुनियावी कामों में इतना मशगूल हो जाता है कि कई बार अपने रब को भूल जाता है। लेकिन नमाज़ इंसान को दिन में पाँच बार यह याद दिलाती है कि उसका असली मालिक अल्लाह है।
जब मोअज्जिन अज़ान देता है —
“हय्या अलस्सलाह” (नमाज़ की तरफ आओ)
तो यह सिर्फ मस्जिद बुलाने की आवाज़ नहीं होती, बल्कि यह अल्लाह की तरफ से अपने बंदे को बुलावा होता है।
नमाज़ पढ़ने वाला इंसान हर सज्दे में अपने रब के करीब हो जाता है। वह अपने गुनाहों की माफी मांगता है, अपने दुख बयान करता है और दिल का सुकून हासिल करता है।
नमाज़ दिल को सुकून देती है
दुनिया में हर इंसान सुकून चाहता है। कोई पैसा कमाकर सुकून ढूंढता है, कोई शोहरत में, तो कोई रिश्तों में। लेकिन असली सुकून सिर्फ अल्लाह की याद में है।
कुरआन शरीफ में अल्लाह तआला फरमाता है:
“जान लो! अल्लाह की याद में ही दिलों को सुकून मिलता है।”
— (सूरह अर-रअद : 28)
नमाज़ पढ़ने वाला इंसान अंदर से मजबूत हो जाता है। मुश्किल हालात में भी उसका भरोसा अल्लाह पर रहता है। वह जानता है कि हर परेशानी का हल उसके रब के पास है।
नमाज़ गुनाहों से बचाती है
नमाज़ इंसान को बुराई और बेहयाई से रोकती है। जो इंसान सच्चे दिल से पाँच वक्त की नमाज़ पढ़ता है, उसके अंदर अल्लाह का डर पैदा होता है। वह झूठ, धोखा, गाली, नाइंसाफी और गुनाहों से बचने की कोशिश करता है।
कुरआन शरीफ में है:
“बेशक नमाज़ बेहयाई और बुरे कामों से रोकती है।”
— (सूरह अल-अंकबूत : 45)
अगर कोई इंसान नमाज़ पढ़कर भी गुनाहों में डूबा रहे, तो उसे अपनी नमाज़ और नीयत पर गौर करना चाहिए। क्योंकि असली नमाज़ वही है जो इंसान की जिंदगी बदल दे।
क़यामत में सबसे पहला सवाल
हदीस शरीफ में आता है कि क़यामत के दिन इंसान से सबसे पहले नमाज़ के बारे में सवाल होगा। अगर नमाज़ सही हुई तो बाकी आमाल भी आसान हो जाएंगे। लेकिन अगर नमाज़ खराब हुई, तो बाकी आमाल भी खतरे में पड़ सकते हैं।
यह बात बताती है कि इस्लाम में नमाज़ की कितनी बड़ी अहमियत है। इसलिए हर मुसलमान को चाहिए कि वह नमाज़ की पाबंदी करे और उसे हल्के में न ले।
नमाज़ में लापरवाही का नुकसान
आज बहुत से लोग दुनिया के कामों के लिये तो समय निकाल लेते हैं, लेकिन नमाज़ के लिये नहीं। कुछ लोग कहते हैं कि अभी उम्र पड़ी है, बाद में नमाज़ पढ़ेंगे। लेकिन मौत का कोई भरोसा नहीं। कौन जानता है कि अगला पल किसका हो?
शैतान हमेशा इंसान को नमाज़ से दूर करने की कोशिश करता है, क्योंकि वह जानता है कि नमाज़ इंसान को अल्लाह के करीब कर देती है। इसलिए हमें हर हाल में नमाज़ की हिफाज़त करनी चाहिए।
बच्चों को भी नमाज़ की आदत दें
मां-बाप की जिम्मेदारी है कि वे अपने बच्चों को छोटी उम्र से ही नमाज़ की आदत डालें। जब घर में नमाज़ का माहौल होगा, तो बच्चों के दिलों में भी दीन की मोहब्बत पैदा होगी।
घर में अगर पाँच वक्त नमाज़ पढ़ी जाए, कुरआन की तिलावत हो और अल्लाह का ज़िक्र किया जाए, तो उस घर में रहमत और बरकत उतरती है।
नतीजा
नमाज़ मोमिन की पहचान है। यह इंसान को उसके रब से जोड़ती है, दिल को सुकून देती है और जिंदगी को सही रास्ता दिखाती है। अल्लाह तआला ने फरमाया:
“मेरी याद के लिये नमाज़ क़ायम कर।”
इसलिए हमें चाहिए कि हम सिर्फ दिखावे की नहीं, बल्कि दिल से नमाज़ पढ़ें। हर नमाज़ को आखिरी नमाज़ समझकर अदा करें और अल्लाह से अपने रिश्ते को मजबूत बनाएं।
अल्लाह तआला हमें पाँच वक्त की नमाज़ की पाबंदी करने की तौफीक अता फरमाए। आमीन।
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