बदगुमानी से बचो और भाईचारे को अपनाओ

बदगुमानी से बचो और भाईचारे को अपनाओ

बदगुमानी से बचो और भाईचारे को अपनाओ






सहीह बुख़ारी में रिवायत है कि नबी करीम ﷺ ने फ़रमाया:

“बदगुमानी से बचते रहो क्योंकि बदगुमानी की बातें अक्सर झूठी होती हैं, लोगों के ऐब तलाश करने के पीछे ना पड़ो, आपस में हसद ना करो, किसी की पीठ पीछे बुराई ना करो, नफ़रत ना रखो, बल्कि सब अल्लाह के बंदे आपस में भाई भाई बन कर रहो।”
(सहीह बुख़ारी 6064)

इस हदीस में इंसानी समाज को बेहतर बनाने के लिए बहुत बड़ी नसीहत दी गई है। अगर हर इंसान इन बातों पर अमल करने लगे तो समाज में मोहब्बत, अमन और भाईचारा पैदा हो जाएगा। आज हमारे समाज में झगड़े, दुश्मनी, नफ़रत और रिश्तों की टूटन की सबसे बड़ी वजह यही बुरी आदतें हैं
 जिनसे नबी ﷺ ने मना फरमाया।




बदगुमानी से बचना

इस्लाम हमें सिखाता है कि किसी के बारे में बिना सबूत बुरा गुमान ना रखें। अक्सर इंसान किसी की बात, हरकत या हालात को देखकर अपने मन से गलत मतलब निकाल लेता है। फिर वही बदगुमानी रिश्तों में दूरी और दिलों में नफ़रत पैदा कर देती है।

कई बार ऐसा होता है कि कोई इंसान किसी मजबूरी की वजह से बात नहीं कर पाता, लेकिन लोग समझ लेते हैं कि वह घमंडी है या जानबूझकर नजरअंदाज कर रहा है। जबकि हकीकत कुछ और होती है। इसलिए मुसलमान का फ़र्ज़ है कि वह अपने भाई के बारे में अच्छा गुमान रखे।

अल्लाह तआला ने भी क़ुरआन में फरमाया कि बहुत से गुमान गुनाह होते हैं। इससे पता चलता है कि बदगुमानी केवल दिल की बीमारी नहीं बल्कि एक गुनाह भी है।




लोगों के ऐब तलाश ना करना

आज का दौर ऐसा हो गया है कि लोग दूसरों की गलतियाँ ढूंढने में लगे रहते हैं। किसी की छोटी सी कमी मिल जाए तो उसे लोगों के सामने बयान करना शुरू कर देते हैं। सोशल मीडिया पर भी यही हाल दिखाई देता है। लेकिन इस्लाम हमें सिखाता है कि अगर किसी में कमी दिखे तो उसे छुपाओ और उसकी इस्लाह की कोशिश करो।

जो इंसान दूसरों के ऐब छुपाता है, अल्लाह क़यामत के दिन उसके ऐब छुपाएगा। इसलिए हमें दूसरों की कमियों पर नजर रखने के बजाय अपनी कमियों को सुधारने की कोशिश करनी चाहिए।




हसद से बचना

हसद यानी किसी की नेमत देखकर यह चाहना कि वह नेमत उससे छिन जाए। यह दिल की बहुत खतरनाक बीमारी है। हसद इंसान की नेकियों को खत्म कर देता है और दिल को बेचैन बना देता है।

अगर किसी को अल्लाह ने दौलत, इज्जत, इल्म या कामयाबी दी है तो हमें उसके लिए खुशी महसूस करनी चाहिए और अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए। हर इंसान की तकदीर अलग होती है। जो अल्लाह ने किसी को दिया है, वह उसकी हिकमत से दिया है।

हसद की वजह से इंसान रिश्ते खराब कर लेता है, दूसरों की बुराई करने लगता है और दिल में जलन रखता है। इसलिए मुसलमान को चाहिए कि वह अपने दिल को साफ रखे।



गीबत और चुगली से बचना

पीठ पीछे किसी की बुराई करना गीबत कहलाता है और यह बहुत बड़ा गुनाह है। आजकल मजाक, गपशप और बातचीत में लोग आसानी से दूसरों की बुराई करने लगते हैं। जबकि इस्लाम में गीबत को अपने मरे हुए भाई का गोश्त खाने जैसा बताया गया है।

हमें सोचना चाहिए कि अगर कोई हमारी बुराई करे तो हमें कितना बुरा लगेगा। इसलिए जो बात अपने लिए पसंद नहीं, वह दूसरों के लिए भी पसंद नहीं करनी चाहिए।



नफ़रत नहीं, भाईचारा फैलाओ

नबी करीम ﷺ ने आखिर में फरमाया कि आपस में भाई भाई बनकर रहो। यही इस्लाम की असली तालीम है। मुसलमान एक दूसरे के दुख-सुख में साथ दें, एक दूसरे की मदद करें और मोहब्बत से पेश आएँ।

अगर किसी से गलती हो जाए तो माफ करना सीखें। छोटी-छोटी बातों पर रिश्ते खत्म कर देना मुसलमान की शान नहीं। दिलों को जोड़ना, सलाम फैलाना, मोहब्बत और इंसानियत का व्यवहार करना ही सच्चे ईमान की निशानी है।



निष्कर्ष

यह हदीस हमें एक बेहतरीन समाज बनाने का रास्ता दिखाती है। बदगुमानी, हसद, गीबत और नफ़रत जैसी बुरी आदतें इंसान और समाज दोनों को बर्बाद कर देती हैं। जबकि अच्छा गुमान, मोहब्बत, माफी और भाईचारा समाज को मजबूत बनाते हैं।

हमें चाहिए कि हम अपने दिलों को साफ करें, दूसरों की गलतियाँ ढूंढने के बजाय अपनी इस्लाह करें और हर मुसलमान के साथ मोहब्बत और इज्जत से पेश आएँ। जब हम नबी करीम ﷺ की इन नसीहतों पर अमल करेंगे, तभी हमारे घर, समाज और उम्मत में सुकून और बरकत आएगी।

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(हदीस) Hadees

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