📖 अल-कुरआन 17:23
अल्लाह तआला कुरआन पाक में फरमाता है:
🤲 "और तुम्हारे रब ने फैसला कर दिया है कि उसके सिवा किसी की इबादत न करो और माँ-बाप के साथ अच्छा सुलूक करो। अगर उनमें से एक या दोनों तुम्हारे सामने बुढ़ापे को पहुँच जाएँ तो उन्हें 'उफ़' तक न कहो, न उन्हें झिड़को और उनसे अदब व नरमी से बात करो।"
📖 (अल-कुरआन 17:23)
🌹 यह आयत हमें माँ-बाप की अहमियत और उनके हुकूक के बारे में बताती है। अल्लाह तआला ने अपनी इबादत के बाद सबसे बड़ा हक माँ-बाप का रखा है। इससे अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि इस्लाम में वालिदैन का मुकाम कितना बुलंद है।
👨👩👧👦 माँ-बाप अल्लाह की बहुत बड़ी नेमत हैं। उन्हीं की वजह से हम इस दुनिया में आए। उन्होंने हमारी परवरिश की, हमें चलना सिखाया, पढ़ाया-लिखाया और हर मुश्किल में हमारा साथ दिया।
🤱 माँ ने हमें नौ महीने अपने पेट में रखा, तकलीफें बर्दाश्त कीं और रात-रात भर जागकर हमारी देखभाल की। वहीं वालिद ने दिन-रात मेहनत करके हमारी हर जरूरत पूरी की। उनकी कुर्बानियों का बदला कोई औलाद कभी पूरी तरह अदा नहीं कर सकती। ❤️
💐 इसलिए अल्लाह तआला ने फरमाया कि माँ-बाप को "उफ़" तक न कहो। सोचिए, जब सिर्फ "उफ़" कहना भी मना है, तो उनसे बदतमीज़ी करना, ऊँची आवाज़ में बात करना या उनका दिल दुखाना कितना बड़ा गुनाह होगा।
😔 आज के दौर में बहुत से लोग अपने माँ-बाप की कद्र नहीं करते। मोबाइल, काम और दुनियावी मसरूफियत में इतने खो जाते हैं कि वालिदैन को वक्त देना भी भूल जाते हैं। कुछ लोग उनसे सख्त लहजे में बात करते हैं, जो इस्लाम की तालीमात के खिलाफ है।
✨ एक सच्चा मुसलमान वही है जो अपने माँ-बाप की इज्जत करे, उनकी खिदमत करे और उनके लिए हमेशा दुआ करता रहे। माँ-बाप की खिदमत सिर्फ एक जिम्मेदारी नहीं बल्कि बहुत बड़ी इबादत भी है।
🌺 हदीस शरीफ में आता है:
🤲 "जन्नत माँ के कदमों के नीचे है।"
यानी जो अपनी माँ की खिदमत करता है और उन्हें राज़ी रखता है, उसके लिए जन्नत का रास्ता आसान हो जाता है।
🏡 जब माँ-बाप बूढ़े हो जाएँ, तब उन्हें हमारी सबसे ज्यादा जरूरत होती है। जिस तरह उन्होंने हमारे बचपन में हमें संभाला, उसी तरह हमें भी उनके बुढ़ापे में उनका सहारा बनना चाहिए।
💞 उनसे प्यार से बात करें, उनकी बात ध्यान से सुनें, उनकी जरूरतों का ख्याल रखें और उन्हें कभी अकेला महसूस न होने दें। उनकी खुशी में ही हमारी कामयाबी छुपी हुई है।
🌟 माँ-बाप की दुआ बहुत कीमती होती है। उनकी दुआ से जिंदगी में बरकत आती है, मुश्किलें आसान होती हैं और दिल को सुकून मिलता है। वहीं उनकी नाराजगी इंसान को नुकसान भी पहुँचा सकती है।
🍃 अगर किसी के माँ-बाप इस दुनिया से जा चुके हैं, तो उनके लिए दुआ करना, सदका देना और उनके दोस्तों व रिश्तेदारों के साथ अच्छा सुलूक करना भी नेक अमल है।
💖 हमें हमेशा याद रखना चाहिए कि दौलत, शोहरत और दुनिया की हर चीज़ दोबारा मिल सकती है, लेकिन माँ-बाप का प्यार दोबारा नहीं मिलता। इसलिए जब तक वे हमारे साथ हैं, उनकी कद्र करें और उनकी खिदमत करें।
🌺 आज ही अपने माँ-बाप के पास जाइए, उनसे मोहब्बत से बात कीजिए, उनका हाथ चूमिए और उनके लिए दुआ कीजिए। हो सकता है उनकी एक दुआ आपकी दुनिया और आखिरत दोनों को सँवार दे। 🤲
✨ हमेशा याद रखिए:
📖 "तुम अपने माँ-बाप ko उफ़ भी न कहो।"
(अल-कुरआन 17:23)
❤️ जिस घर में माँ-बाप की इज्जत होती है, उस घर में अल्लाह की रहमत और बरकत नाज़िल होती है। अल्लाह तआला हमें अपने वालिदैन की खिदमत करने और उन्हें खुश रखने की तौफीक अता फरमाए। आमीन। 🤲🌹🌷 "माँ-बाप की खिदमत दुनिया की सबसे बड़ी इबादतों में से एक है।" ❤️✨
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