Salaam me Mukhtalif Lafzo ke Mayne
इस्लाम में सलाम सिर्फ एक आम बात नहीं है, बल्कि यह मोहब्बत, दुआ, अमन और भाईचारे का खूबसूरत तरीका है। जब कोई मुसलमान दूसरे मुसलमान से मिलता है तो वह “अस्सलामु अलैकुम” कहकर उसके लिए सलामती की दुआ करता है। यह सिर्फ एक शब्द नहीं बल्कि दिल से निकली हुई नेक दुआ होती है।
आजकल बहुत से लोग जल्दी बोलने या आसान बनाने के चक्कर में सलाम के अल्फ़ाज़ को बदल देते हैं। कई लोग सही तरीके से सलाम नहीं बोलते और उसके मायने भी बदल जाते हैं। इसलिए हर मुसलमान के लिए यह जानना जरूरी है कि सलाम सही तरीके से कहा जाए।
सही सलाम क्या है?
सही तरीका यह है :
“अस्सलामु अलैकुम”
इसका मतलब होता है :
“आप पर सलामती हो।”
यह एक बहुत प्यारी और बरकत वाली दुआ है। जब कोई इंसान दूसरे को यह कहता है तो वह उसके लिए अमन, रहमत और सुरक्षा की दुआ करता है। जवाब में कहा जाता है
“वअलैकुम अस्सलाम”
यानी :
“और आप पर भी सलामती हो।”
गलत तरीके से सलाम बोलने की समस्या
आजकल मोबाइल, छोटी लिखाई और जल्दी टाइप करने की वजह से लोग सलाम को छोटा कर देते हैं। कुछ लोग आधा सलाम लिखते हैं, कुछ गलत उच्चारण करते हैं। ऐसा करना ठीक नहीं माना गया, क्योंकि इससे शब्दों का मतलब बदल सकता है।
सलाम बहुत पाक और अहम दुआ है। इसलिए इसे पूरा और सही बोलना चाहिए।
सही अदायगी क्यों जरूरी है?
हर भाषा में शब्दों का अपना मतलब होता है। अगर किसी शब्द को गलत बोला जाए तो उसका अर्थ भी बदल सकता है। इसी तरह अरबी अल्फ़ाज़ में भी बहुत फर्क पड़ जाता है।
उदाहरण के तौर पर :
“अस्सलामु अलैकुम” का मतलब सलामती की दुआ है।
लेकिन अगर कोई इसे बिगाड़कर बोले तो उसका अर्थ गलत या बुरा बन सकता है।
इसी वजह से इस्लाम में सही लफ्ज़ों की अहमियत बताई गई है।
सलाम मोहब्बत बढ़ाता है
हमारे नबी मुहम्मद ﷺ ने सलाम को आम करने की शिक्षा दी। सलाम करने से दिलों में प्यार बढ़ता है, नाराज़गी खत्म होती है और आपस में भाईचारा मजबूत होता है।
जब कोई मुस्कुराकर सलाम करता है तो सामने वाले को इज़्ज़त और अपनापन महसूस होता है। यही वजह है कि इस्लाम में सलाम को बहुत बड़ा नेक अमल बताया गया है।
छोटे सलाम से बचना चाहिए
कुछ लोग सिर्फ “सलाम” लिख देते हैं, कुछ लोग अधूरा लिखते हैं। बेहतर यह है कि पूरा सलाम लिखा और बोला जाए। पूरा सलाम बरकत वाला होता है और सुन्नत के मुताबिक भी।
अगर हम दुनिया की किसी बड़ी शख्सियत का नाम पूरा सम्मान से लेते हैं, तो फिर सलाम जैसी दुआ को छोटा क्यों करें?
बच्चों को भी सही सलाम सिखाएं
आजकल बच्चे मोबाइल और इंटरनेट से बहुत कुछ सीखते हैं। अगर उन्हें शुरू से सही सलाम सिखाया जाए तो वे आगे भी उसी तरह बोलेंगे। घर में मां-बाप को चाहिए कि बच्चों को पूरा सलाम करना सिखाएं।
जब बच्चा घर में आए तो उसे सिखाएं कि वह कहे :
“अस्सलामु अलैकुम”
और जवाब में :
“वअलैकुम अस्सलाम”
इससे बच्चों में इस्लामी आदाब भी आएंगे और अच्छी आदतें भी बनेंगी।
सलाम करने के फायदे
सलाम करने के बहुत से फायदे हैं :
♥️ दिलों में मोहब्बत पैदा होती है।
♥️ आपसी नफरत कम होती है।
♥️ रिश्ते मजबूत होते हैं।
♥️ अल्लाह की रहमत मिलती है।
♥️ नेकियां हासिल होती हैं।
♥️ समाज में अमन फैलता है।
एक छोटा सा सलाम इंसान के चेहरे पर मुस्कान ला सकता है।
सोशल मीडिया पर भी सही सलाम लिखें
आजकल लोग संदेशों में जल्दी लिखते हैं। लेकिन कोशिश करें कि सलाम पूरा लिखा जाए। क्योंकि यह सिर्फ एक शब्द नहीं बल्कि दुआ है।
गलत तरीके से लिखने के बजाय साफ और सही लिखें :
“अस्सलामु अलैकुम”
इससे पढ़ने वाले को भी अच्छा महसूस होगा और दुआ का सही मतलब भी बना रहेगा।
सलाम इस्लामी पहचान है
सलाम मुसलमानों की खूबसूरत पहचान है। जब कोई मुसलमान दूसरे को सलाम करता है तो उसमें प्यार, इज़्ज़त और दुआ तीनों शामिल होती हैं। इसलिए इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए।
हम कोशिश करें कि :
🔸सलाम सही बोलें,
🔸सही लिखें,
🔸और ज्यादा से ज्यादा लोगों में सलाम को आम करें।
निष्कर्ष
सलाम इस्लाम की बहुत सुंदर शिक्षा है। “अस्सलामु अलैकुम” कहना सिर्फ एक आदत नहीं बल्कि दूसरे इंसान के लिए सलामती की दुआ करना है। इसलिए इसके अल्फ़ाज़ सही बोलना और लिखना बहुत जरूरी है।
हमें चाहिए कि हम जल्दी या मज़ाक में सलाम के शब्द न बिगाड़ें। सही सलाम बोलें, बच्चों को सिखाएं और समाज में मोहब्बत और अमन फैलाएं।
अल्लाह हम सबको सही तरीके से सलाम करने और इस्लामी आदाब पर चलने की तौफीक़ अता फरमाए।
आमीन।
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